-रात में नहीं मिल सका साधन, अगले दिन महिलाओं ने संभाला मोर्चा
गैरसैंण। अभी तक आपने पहाड़ की सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर अनेक खबरें पढ़ी, देखी और सुनी होंगी। अब राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण तहसील से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो पीडब्ल्यूडी और स्वास्थ्य विभाग के लिए मुंह चिढ़ाने वाली है। हर जगह रोड कनेक्टविटी और हर जगह स्वास्थ्य सुविधा का ढिंढोरा पीटने वाले इन विभागों की मंत्री जब इस वीडियो को देखेंगे तो उन्हें खुद ताज्जुब होगा कि लोग रोड और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए कितने परेशान हैं। पहाड़ में सड़क सुविधा का अभाव किस तरह लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है, इसकी तस्वीर विकासखंड गैरसैंण के कुनीगाड़ क्षेत्र के गोगनाणी गांव में देखने को मिली। बीते दिनों गांव के 61 वर्षीय बीमार बलवंत सिंह को गांव की महिलाओं ने डोली में बैठाकर करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर सड़क मार्ग तक पहुंचाया। ऊबड़-खाबड़ और जंगल के रास्ते पर महिलाओं द्वारा डोली को कंधा लगाकर चार किलोमीटर की दूरी तय करने की यह घटना इन दिनों पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह घटना जहां पहाड़ी गांवों में सड़क सुविधा की बदहाली को उजागर करती है, तो वहीं मातृशक्ति की कर्मठता और विषम परिस्थितियों से जूझने की क्षमता का भी उदाहरण है।
कुनीगाड़ क्षेत्र की कोठा ग्राम पंचायत से करीब चार किलोमीटर पैदल दूरी पर स्थित गोगनाणी तोक निवासी 61 वर्षीय पेंटर बलवंत सिंह पुत्र हुकम सिंह पेंटिंग का कार्य कर आजीविका चलाते हैं। गांव में पत्नी देवकी देवी ओर छोटे दिव्यांग बेटे के साथ रहने वाले बलवंत सिंह की बीते दिनों अचानक तबीयत बिगड़ गई। गांव के अधिकांश पुरुष रोजगार के सिलसिले में बाहर होने के कारण रात के समय उन्हें अस्पताल नहीं ले जाया जा सका।
अगले दिन गांव की महिलाओं ने बलवंत सिंह को डोली में बैठाया और किसी तरह करीब चार किलोमीटर दूर कोठा बैंड तक पहुंचाया। इसके बाद नजदीकी गांवों के रिश्तेदार उन्हें चैखुटिया अस्पताल ले गए। चिकित्सकों ने जांच के बाद हृदय संबंधी समस्या बताते हुए उन्हें बेस अस्पताल अल्मोड़ा रेफर कर दिया। परिजनों के अनुसार उपचार में देरी के चलते बलवंत सिंह की मौत हो गई। बलवंत सिंह की असमय मौत से आहत उन्हें सड़क तक पहुंचाने वाली महिलाओं में शामिल गीता, धन्ना, शांता, कुसमा, छुमा, मंजू, मीना, पूजा, गंगा देवी, पुष्पा देवी, कमला, राधा, दीपा और मधु ने रुंधे गले से कहा कि कष्ट उठाना हमारी नियति बन गई है, लेकिन इससे सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। गांव के बुजुर्ग धर्म सिंह और दान सिंह कहते हैं कि उनकी पैदाइश आजादी के आसपास की है, लेकिन सड़क सुविधा के मामले में उनके लिए आज भी गुलामी का दौर ही चल रहा है।